P O L I T I C S ; victim & V I C T O R Y



Three Days back I received a message from someone of a very high repute saying: We feel sorrow at the death of the rape victim. (I was shocked When I found that there is no news confirming the message in media.)

Later in Media: The girl has been taken outside India for treatement (I was still unable to relate.)

Yesterday a man comes from Delhi and told: Security measures are being titned in the Capital at a huge level. (Still I was not able to relate.)

Today morning news: The victim was declared dead at 2:00am. All the senior officials were present there at that time. 10 Delhi metro stations have been closed. 144 enforced in the Capital.

(Cycle of incidents repeates within me: Was that message true? Was she already dead when taken abroad? Why she was declated dead at 2:00am when all the newspapers are already published? Were the senior officials at hospital waiting for the final call from Delhi?)

Now anticipating a secret cabinet level diner after an official meeting where:
One Cabinet Minister: क्यू Home Minister साहब कितने करोड़ लगा दिया फिर इस सब में?
Home Minister: (both laughs) Cheers...

सूत्रधार: और इस तरह POLITICS एक बार फिर CHAMPION...


MOTHER IMPOSSIBLE

 
सूत्रधार : नमस्कार और स्वागत है आपका आज की मंचिय प्रस्तुति Mother Imposible में . Mother Imposible का कथावस्तु जब मेरे अंतर में उभरा उस समय मैं इसके लिए एक Short फिल्म की परिकल्पना कर रहा था . एक Silent Short Film. लेकिन वो जैसा के कहते हैं ना के मंच के प्रतिभ्गियों की नियति मंच ही में निहित है , मुझे भी शायद इसी लिए इसकी प्रस्तुति के लिए मंच ही माध्यम मिला, और मंच भी कौन सा, कोई ऐसा वैसा मंच नहीं बल्कि आधुनिक रंगमंच की कमोबेश सभी सुख सुविधाओं से सुसजित ये रंगमंच. ऐसा लगता है जैसे अभी कल ही की बात हो 1994, 2004, 2006 और आज 2012. आज भी वो दिन याद करता हूँ तो सिहर उठता हूँ. वो चंद एक रोज़ मेरे लिए गहरे असमंजस भरे गुजरे थे, असमंजस इस बात का के आखिर इस Silent Short Film के लिए लिखी गई पटकथा को मंच के लिए रूपांतरित करूँ तो करूँ कैसे. सच जानिएगा साहिब शब्दों के माध्यम से शुन्य का सृजन करना मेरे लिए कतई आसान काम न था. बहुत डर लगा, लगा कि इस अभिशप्त भूमि पर एक कदम भी रखा तो फिर बच कर नहीं लौट पाउँगा....लेकिन वो जैसा की कहते है न की एक नशा होता है थिएटर करने में. अन्धकार के गरजते हुए महासागर की चुनोती को स्वीकार करने में, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने में, अनमापी गहराईयों में उतरते जाने में, और फिर खुद को सारे खतरों में डाल कर वहाँ से आस्था के, सत्य के, प्रकाश के कुछ कणों को बटोर कर, समेट कर धरातल तक ले आने में. -नशा - और जिस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला मिला रहता है के उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है वो नशा - बस उसी की अनुभूति के लिए मैं एक बार फिर यहाँ पंजाब से कोलकत्ता खिंचा चला आया, जय हो नाट्य कला की आधुनिक रंग परम्पराओं की के जिनका आश्रय लेकर मैं इस कहानी को रूपांतरित करने का यह साहस या आप ये कह लीजिये के ये दुसाहस जुटा पाया. तो आइये मैं आपको अब बिना किसी विलंभ कहानी या पटकथा के अनुरूप इसके पात्र और परिस्थितियों से परिचित करवा दूँ... यह है मेरी कहानी का पात्र John. जी... जी नहीं, मेरी कहानी का पात्र john फिल्मो में अभिनय नहीं करता अलबत्ता उसकी अपनी एक छोटी सी दुनिया ज़ुरूर है. और उसकी इसी दुनिया का हिस्सा है यह चंद एक magazines..... कितने मासूम बच्चे है ना. ये उसका चश्मा, उसका mobile phone, ये बड़ा सा आइना, कपडे, बिस्तर, कमरा और उसकी माँ की ये तस्वीर. माँ को बचपन में ही खो दिया था John ने. पिता को दारु और बीडी दोनों पीने की आदत थी जो John को बिलकुल पसंद न थी. इसी लिए शायद वो गाँव छोड़ यहाँ शहर भाग आया था. आज John एक बड़े से अस्पताल में एक ward boy का कम कर रहा है. ये कमरा उसको जिस अस्पताल में वो काम करता है उन्होंने ही दिया है. ये कमरा और ये attached bathroom, आप सोच रहे होंगे और kitchen? तो साहिब kitchen की ज़ुरूरत ही क्या है - अस्पताल की canteen किस मर्ज़ की दवा है. आज 4 रोज़ बाद John चैन की नींद सो पाया है. 4 रोज़ बाद इसलिए क्युकी..... खैर वो आप कहानी के अंत तक आते-आते खुद ही समझ जायेंगे. अभी सुबह होने में वक़्त है, सोने दो.. सोने दो इसे...

(
Mime of sleeping in bed and then alarm on mobile phone)
John: ओह! मारे गए, मिसेस साहनी मेरा इंतज़ार कर रही होंगी.
(Switches on fm radio, mime and movement for getting ready for the hospital, switches off radio after getting ready).
अच्छा माँ, शाम को मिलता हूँ, प्रणाम... Mrs. Sahai मेरा इंतज़ार कर रही होंगी...
(Transition Music to change the set)
(In hospital) good morning Mrs. Sahaye. कैसी है आप? रात को नीद तो अच्छी आई ना?
ओह, अच्छा.... हममम... ऐसे समय मे यह सब होता है . आप पहली बार मां बन रही है ना, मैं समझ सकता हूँ. मगर आप बिलकल फिक्र मत किजिये. John के होते हुए No Tension. अभी आप आराम किजिए. बस मैं यू गया और यू आया . मिलते हैं थोड़ी देर में. O.K.
सूत्रधार : जब भी अस्पताल मे Mrs. Sahaye जैसा कोइ patient आता तो john बेहद खुश हो जाता. घर मे आने वाली खुशी की उमग शायद उस patient को या उसके घरवालों को उतनी नहीं होती थी जितनी john को. John एक ही दिन मे Mrs. Sahaye के साथ इतना घुलमिल गया था जैसे बरसो की जान - पेहचान हो . अस्पताल मे John कई काम करता था मसलन patient की bed-sheet बदलनी, बच्चों के nappies बदलने , patients की और बच्चों की दवाई का ध्यान रखना, जो बच्चों सातवें या आठवें महिने में पैदा हो गए थे, जिनहें incubator मे रखा जाता है, उस incubator का ध्यान रखना, तापमान को नियन्त्रित करना.... हालांकि ये सारे काम जो उसके नही थे, ये nurse के थे लेकिन फिर भी John को ये सब करने मे मज़ा आता. वो खुशी - खुशी ये काम करता था और जब भी मौका मिलता वो लपक कर पहुंच जाता था Mrs. Sahaye के पास.
John : Hello Mrs. Sahaye. कैसी है आप? देखिये मैं क्या लाया हूँ... stethoscope.. आपको पता है इससे क्या होता है? मै बताता हूँ.. ये सुनिए.....हममममम .. आपको नहीं सुना ना, मै सुनाता हूँ ... ये लीजिये, अब सुनिए... सुना, है ना नटखट, शरारती. अच्छा अभी डॉक्टर साहिब जाएंगे. मैं इसको वापिस रख आता हूँ. अभी मिलता हूँ मैं आपको.
सूत्रधार : सारा दिन John की ये छोटी-छोटी शैतानिया अपने patients के साथ चलती रहती थी और patients को भी इसमें मजा आता था तभी तो आज तक किसी ने भी John की कोइ शिकायत नहीं की थी. सब खुश थे. डॉक्टर भी और मरीज़ भी और अब तो John खुद जचगी के काम में इतना trained हो चूका था कि अच्छी से अच्छी दाई भी Jhon का काम देख ले तो दांतों तले उंगलिया चबा ले . यकीं नहीं ? तो सुनिए ये बगल वाली Mr. Benarji का जब time आया तो मालूम सारे doctors bussy. जिसकी ड्यूटी वो फस गया trafic में. अब शहर का traffic तो आपको पता ही है.....तब सारा काम किसने समभाला .... किसने..... हां John ने और किसने .... अपने काम के साथ बेहद प्यार था Jhon को... और वैसे भी अब करत करत अभ्यास तो, जड़मति होत सुजान ना ...
( John अस्पताल का काम कर रहा है - in Mime)
अक्सर अस्पताल के काम में john इतना खो जाता था कि उसे खाने का भी ख्याल नहीं रहता था. और आज भी ऐसा ही हुआ. सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम होने को आई और खाने का कोइ अता पता ही नहीं और तभी उसे पता चली आज की ताज़ा खबर कि आज... Mrs. Banerjee अपने बच्चे के साथ घर वापिस जा रहीं हैं. चार रोज़ पहले वो भी इसी तरह अस्पताल मे दाखिल हुई थी. जचा बचा दोनों खुश लेकिन John....
John : अच्छा Mrs. Banerji मुने का अछे से ख्याल रखियेगा, सारे टीके समय पर लगवाने मत भूलना, मामू की याद ज़रूर कराते रहना इसे. मुन्ना bye. .... bye मुन्ना ... bye...
(Music)
सूत्रधार : आहा ..... John के लिए ये पल बेहद दुखदाई होते थे. वो समझ नहीं पाता था कि वो क्या करे?? जब भी Mrs. Banerjee जैसा कोइ patient अपने बच्चे के साथ घर लौटने को होता तो John बेहद उदास हो जाता. ना जाने उसे क्यों लगता कि जैसे उससे कोइ उसकी अपनी चीज़ छीने लिये जा रहा हो. वो चाह कर भी उसे रोक नहीं पाता. वो जानता है कि वो कुछ नहीं कर सकता. उसकी यही नियती है..लेकिन क्यों हर बार वो .... वो ये अच्छी तरह जानता था कि कल Mrs. Sahaye भी इसी तरह अपने बच्चे के साथ अपने घर वापिस चली जाएँगी और वो कुछ नहीं कर पाएगा. परसों कोइ और Mrs. Singh, नर्सो Mrs. Chopra और फिर कोइ Mrs. अमुक इसी तरह .... इसी तरह ....इसी ख्याल के कारन अब उसे अपने इस काम से भी डर लगने लगा था . वो सब कुछ छोड़ कर भाग जाना चाहता था. आज इसी लिए अस्पताल से भी वो बिना किसी को कुछ कहे, कुछ भी कहे सुने चुपचाप निकल गया. वो कहीं दूर चला जाना चाहता था. बहुत दूर....
वो गया गहरे नीले समंदर के किनारे. ( music of sea waves) सागर किनारे बैठा घंटों सोचता रहा. समंदर बहुत गहरा था ... लेकिन आज उसके अंदर के सवाल इतने गहरे थे कि समंदर भी सुन ले तो डूब जाये...
( Mime )
और फिर र्जैसे कुछ सोच लिया हो. वो घर की और वापिस चल पड़ा.

( room
)
बिस्तर पर लेटा-लेटा वो फिर अपने ख्यालो में खो गया. फिर अपनी छोटी सी दुनिया में ग़ुम हो गया. बत्ती को कभी जलाता - बूझाता, कभी फिर on करता, फिर off करता.... on-off, on-off, on-off, on-off. फिर करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगा. लेकिन वो जानता था कि उसे नींद नहीं आएगी. उसे तरह-तरह की आवाज़े सुनाई दे रही थी... बच्चो की किल्कारिया, पानी के बुलबुले, जैसे वो किसी माँ की कोख़ में बंद बच्चे की पुकार सुन रहा हो. John डर गया. उसने एक दम से बत्ती का switch जलाया लेकिन light नहीं जली... ये क्या ... अचानक से ऐसा.... कमरे मे ये तूफ़ान कैसा. John ने torch on करके देखा.... गलती से उसने पंखे का switch दबा दिया था. जल्दी से उसने पंखे को बंद किया और light on की.
John : ये मुझे क्या हो रहा है....John....Jooooohn... उफफ्फ्फ्फ़... .
(Mime लडखडाता हुआ John dressing table के शीशे के पास पहुंचा फिर गुसलखाने में और वहा पहुँच कर अपने ऊपर पानी डालने लगता है )
John : चंदा है तू मेरा सूरज है तू... चंदा है तू मेरा सूरज है तू... औ मेरी आँखों का तारा है तू.....
(Mime वो फिर आइने के पास आता है और आइने मे खुद को बड़े ग़ोर से देखता है और फिर.....)
John: (laughter) John...John.. तू ... तू.. साला John........... माँ..माँ देख तेरा John क्या सोच रहा है.. देख माँ क्या सोच रहा है तेरा John.. माँ.. माँ John माँ बनना चाहता है माँ... माँ John माँ बनना चाहता है माँ..वो कभी नहीं बन सकता माँ. फिर भी वो बनना चाहता है माँ.... माँ... (crying)
सूत्रधार : John माँ नहीं बन सकता. ये मैं आप और हम सभी जानते हैं वही तो है mother impossible. लेकिन आप ये नहीं जानते कि John मैं और मुझ मैं कोई ज्यादा अंतर नहीं है ... वही हूँ मै. जी हाँ. मेरी भी स्थितियां परिस्थितिया ठीक वैसी ही है. john उस रात भी सो नहीं पाया. मै भी नहीं सो पाता हूँ क्यूंकि मेरे भी अंतर मे, गहम गुफ़ाओ मे कहीं अनेको नेक किस्से कहानियाँ कथाएँ संवाद कोंधते रहते हैं वो इस मंच पर आना चाहते हैं जन्म लेना चाहते हैं लेकिन मै ... मैं जानता हूँ कि मै कभी भी उन्हें इस मंच पर जन्म नहीं दे पाऊंगा...कभी भी नहीं.
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