बंधन

कभी जो मिले ना वो ऐसे मिले हैं
कि बरसों यूँ ही साथ जैसे चलें हैं
ये एहसास क्या है जो यूँ जागता है
दिलों को जो अनजाने यूँ बांधता है
हवाओं से खुशबु ये कैसे जुडी है
घटा उड़ते बादल से जैसे बंधी है
किसे है पता ये कशिश कौन सी है
जो साहिल पे लहरों को यूँ खींचती है
उभरते हैं कुछ ख्वाब तन्हाइयों में
उठे दर्द सा दिल कि गहराइयों में
मिला फिर भी कोई मिला तो नहीं
मगर दिल को कोई मिला तो नहीं
ये रस्मों रिवाजों की दुनिया ना जाने
कोई ऐसे रिश्तों को माने ना माने
ये कुछ तो है आखिर ये कैसे हुआ है
ये कुदरत, ये किस्मत, ये चाहत,
ये क्या है
कदम ऐसे रुक रुक के क्यूँ उठ रहे हैं
यूँ पलकों पे आंसू ये क्यूँ थम गए हैं
यहाँ वक्त जैसे ठहर सा गया है
ये कैसा है मन्ज़र, ये कैसा सिला है